खरसावां में इबादत में गुजरी शब-ए-कद्र की रात,
सबसे अजीम रात के इबादत से गुनाह हो जाती है माफ,
शब-ए-कद्र में नाजिल हुआ था कुरआन करीम
kharsawan
शब-ए-कद्र की इबादत का कोई दूसरा सानी नहीं। दरअसल इस्लाम धर्म में इस रात को हजार रातों से बेहतर रात बताया गया है। इस रात की फजीलत खुद कुरआन में बयान किया गया है। इस रात में अल्लाह फरमाते है कि कोई माफी का लतबगार, जिसे में माफ कर दूं। है कोई रिज्क का चाहने वाला, जिसकी रिज्क कुशादा कर दूं। इस रात में मांगी गई बंदे की हर दुआ कुबूल होती है। लिहाजा, शब-ए-कद्र की रात में लोग रातभर इबादतों में मशगूल रहते हैं, जिनमें नफिल नमाज, कुरआन की तिलावत, तसबीहात (जाप), जिक्रो-अजकार वगैरा पढ़ना अहम है। नफिल उस नमाज को कहते हैं, जो अनिवार्य नहीं, बंदा अपनी इच्छा से अपने रब को राजी करने के लिए पढ़ता है। शब-ए-कद्र की रात में खरसावां के बेहरासाई मदीना मस्जिद, कदमडीहा, मस्जिद निजामुददीन गोढपुर एवं मस्जिदे बिलाल कदमडीहा में मुस्लिम समाज के लोग एकजूट होकर सादगी से इबादत की गई। मुस्लमानों ने कुरआन की तिलावत की। देश में अमन, अमन-चौन और भाईचारे के लिए अल्लाह तआला से दुआ मांगी। शब-ए-कद्र की रात सबसे अजीम रात में से एक है। इस रात को कुरआन करीम नाजिल हुआ था। इस रात की फजीलत खुद कुरआन में बयान किया गया है।
इसी रात में हुआ था कुरआन का नुजूल-मौलाना रजवी
मदिना मस्जिद बेहरासाई के मौलाना मो0 आसिफ इकबाल रजवी ने बताते है कि शब-ए-कद्र की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि अल्लाह ने अपने बंदों की रहनुमाई के लिए इसी रात में कुरआन को आसमान से जमीन पर उतारा था। यही वजह कि इस रात में कुरआन की तिलावत भी सिद्दत से की जाती है। शब-ए-कद्र गुनाहगारों के लिए तौबा के जरिए अपने पापों पर पश्चाताप करने और माफी मांगने का बेहतरीन मौका होता है। अकीदत और ईमान के साथ इस रात में इबादत करने वालों के पिछले सारे गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। हालांकि, उलेमा का कहना है कि जहां भी पिछले गुनाह माफ करने की बात आती है वहां छोटे गुनाह बख्श दिए जाने से मुराद है। दो तरह के गुनाहों कबीरा (बड़े) और सगीरा (छोटे) में, कबीरा गुनाह माफ कराने के लिए सच्ची तौबा लाजमी है। यानी इस यकीन और इरादे के साथ कि आइंदा दोबारा कबीरा गुनाह नहीं होगा।
रमजान के आखिरी पांच रातों में से एक है शब-ए-कद्र
पैगंबर साहब के एक साथी ने शब-ए-कद्र के बारे में पूछा तो आपने बताया कि वह रमजान के आखिर अशरे (दस दिन) की ताक (विषम संख्या) यानी 21, 23, 25, 27 और 29 की रातों में से एक है। आप ने शब-ए-कद्र पाने वालों को एक मख्सूस दुआ भी बताई, जिसके मानी है श्ऐ अल्लाह तू बेशक माफ करने वाला है और पसंद करता है माफ करने को, बस माफ कर दे मुझे भी।
इसलिए मुसलमान शब-ए कद्र में करते है इबादत
इस्लाम धर्म के आखिरी पैगम्बर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहुअलैहिवसल्लम का फरमान है कि शब-ए-कद्र अल्लाह ने सिर्फ मेरी उम्मत (अनुयायी) को अता फरमाई है। यह हमसे पहले के पैगम्बरों की उम्मतों (अनुयाइयों) को नहीं मिली। पैगम्बर हजरत मुहम्मद ने अपने साथियों से बताया कि पिछली उम्मत के लोगों की उम्र काफी लंबी होती थी। वह लोग वर्षों तक लगातार अपने खुदा की इबादत किया करते थे। पैगंबर साहब के साथियों ने जब उन लोगों की लंबी इबादतों के बारे में सुना तो उन्हें रंज हुआ कि इबादत करने में वह उन लोगों की बराबरी नहीं कर सकते। इसपर पैगम्बर मुहम्मद साहब ने बताया कि उन लोगों की लंबी उम्र के बदले में अल्लाह ने हमारी उम्मत को ऐसी एक रात अता की है, जो हजार रातों से अफजल है, जिसमें इबादत करने का सवाब हजार रातों की इबादत से ज्यादा है।
September 7, 2026 1: 56 am
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