तिरुपति बालाजी मंदिर में गूंजी खरसावां छऊ की गूंज, झारखंडी संस्कृति की छटा से मंत्रमुग्ध हुए दर्शक, ‘माया बंधन’ और ‘शिकार नृत्य’ की शानदार प्रस्तुति ने मोहा मन, राष्ट्रीय मंच पर कलाकारों ने बढ़ाया झारखंड का मान, ब्रह्मोत्सव में 169 कला दलों के करीब 3,700 कलाकारों ने लिया हिस्सा
Kharsawan
खरसावां। आंध्र प्रदेश के प्रसिद्ध तिरुमाला तिरुपति बालाजी मंदिर में आयोजित त्रिवार्षिक नवरात्रि ब्रह्मोत्सव में खरसावां छऊ नृत्य की शानदार प्रस्तुति ने झारखंड की समृद्ध लोक संस्कृति की अनूठी छाप छोड़ी। छऊ नृत्य कला केंद्र, खरसावां के कलाकारों ने अपनी पारंपरिक नृत्य शैली, आकर्षक भाव-भंगिमाओं और बेहतरीन मंच प्रदर्शन से दर्शकों का मन मोह लिया। इस उपलब्धि से खरसावां की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली।

त्रिनेत्र सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स के सौरव दुबे एवं बसंत कुमार के नेतृत्व में कलाकारों ने श्रीकृष्ण लीला पर आधारित ‘माया बंधन’ और झारखंड की पारंपरिक लोक संस्कृति को दर्शाने वाले ‘शिकार नृत्य’ की प्रभावशाली प्रस्तुति दी। पौराणिक प्रसंगों और लोक परंपराओं को छऊ नृत्य की विशिष्ट शैली में मंच पर उतारकर कलाकारों ने दर्शकों को झारखंड की सांस्कृतिक विरासत से रूबरू कराया।

169 कला दलों के 3,700 कलाकारों ने लिया हिस्सा
12 से 21 अक्टूबर तक आयोजित इस भव्य धार्मिक एवं सांस्कृतिक उत्सव में देश के विभिन्न राज्यों से आए 169 कला दलों के लगभग 3,700 कलाकारों ने भाग लिया। कलाकारों ने अपनी-अपनी क्षेत्रीय कला, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन किया। देशभर की विविध लोक कलाओं के बीच खरसावां छऊ की प्रस्तुति ने अपनी अलग पहचान बनाई।
कलाकारों ने कठिन शारीरिक मुद्राओं, लयबद्ध गतिविधियों, पारंपरिक शैली और अनुशासित सामूहिक प्रदर्शन के माध्यम से छऊ नृत्य की विशेषताओं को प्रदर्शित किया। उनकी प्रस्तुति ने यह संदेश दिया कि झारखंड की लोक कलाएं देश की सांस्कृतिक विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

लाखों दर्शकों तक पहुंची लोक कला की पहचान
मंदिर प्रबंधन की ओर से जारी सूचना के अनुसार, कार्यक्रम का आनंद 6.46 लाख लोगों ने लिया। वहीं, अनुमान के मुताबिक, पूरे उत्सव के दौरान करीब 10 लाख दर्शक विभिन्न कार्यक्रमों के साक्षी बने। इतने बड़े मंच पर खरसावां के कलाकारों को अपनी कला प्रदर्शित करने का अवसर मिलना क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
खरसावां छऊ नृत्य अपनी विशिष्ट नृत्य शैली, शारीरिक कौशल, पारंपरिक वेशभूषा और पौराणिक कथाओं की सशक्त अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध है। तिरुपति बालाजी मंदिर के ब्रह्मोत्सव में प्रस्तुति के माध्यम से कलाकारों ने इस पारंपरिक कला को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाया।
इस आयोजन ने न केवल खरसावां छऊ की विशिष्टता को सामने रखा, बल्कि झारखंड की लोक संस्कृति और परंपराओं को राष्ट्रीय सांस्कृतिक मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर भी दिया। कलाकारों की इस भागीदारी को क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के प्रचार-प्रसार की दिशा में उल्लेखनीय कदम माना जा रहा है।
