खरसावां के आकर्षिणी पीठ पर विधि-विधान से हुई धुलिया जंताल पूजा, श्रद्धालुओं ने मांगी क्षेत्र की सुख-समृद्धि, अच्छी बारिश और फसल की कामना, राजा-राजवाड़े के समय से चली आ रही परंपरा,
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खरसावां के प्रसिद्ध मां आकर्षिणी शक्ति पीठ पर शनिवार को वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार वार्षिक धुलिया जंताल पूजा का आयोजन श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ किया गया।पारंपरिक विधि-विधान से पूजा के दौरान पूरा आकर्षिणी पीठ परिसर भक्तिमय वातावरण में डूबा रहा।
आकर्षिणी पीठ के दिउरी नारायण सरदार आदि ने परंपरागत रीति-रिवाज के अनुसार धुलिया जंताल पूजा संपन्न कराई। पूजा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। लोगों ने मां आकर्षिणी की पूजा-अर्चना कर क्षेत्र में समय पर और पर्याप्त बारिश होने तथा किसानों के खेतों में अच्छी फसल होने की मन्नत मांगी। इसके साथ ही क्षेत्र में शांति, खुशहाली और समृद्धि की भी कामना की गई।

मां के दरबार तक पैदल पहुंचे श्रद्धालु
मां आकर्षिणी का शक्ति पीठ रमणीक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। श्रद्धालु पैदल पहाड़ी पर चढ़कर मां के दरबार तक पहुंचे और पूजा-अर्चना की। हरे-भरे पहाड़ के शीर्ष पर बड़े आकार की चट्टाननुमा शिला पर मां आकर्षिणी की पूजा की जाती है। स्थानीय लोगों में इस शक्ति पीठ के प्रति गहरी आस्था है। मान्यता है कि श्रद्धालु सच्चे मन से मां आकर्षिणी से जो मन्नत मांगते हैं, मां उनकी मनोकामना पूरी करती हैं। इसी आस्था के कारण धुलिया जंताल पूजा के अवसर पर आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज के श्रद्धालु भी आकर्षिणी पीठ पहुंचते हैं।
पूजा के बाद अच्छी बारिश की है मान्यता
स्थानीय लोगों के अनुसार धुलिया जंताल पूजा का संबंध क्षेत्र की कृषि और वर्षा से भी जुड़ा हुआ है। वर्षों से चली आ रही परंपरा के तहत पूजा के माध्यम से मां आकर्षिणी से अच्छी बारिश की प्रार्थना की जाती है। मान्यता है कि पूजा के बाद मां प्रसन्न होती हैं और क्षेत्र में अच्छी वर्षा होती है।
इस वर्ष भी क्षेत्र में खेती-किसानी के लिए पर्याप्त बारिश और अच्छी फसल की कामना को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा गया। किसानों के लिए समय पर बारिश होना बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में जंताल पूजा के दौरान लोगों ने मां से क्षेत्र के खेत-खलिहानों को खुशहाल रखने की प्रार्थना की।
राजा-राजवाड़े के समय से चली आ रही परंपरा
आकर्षिणी पीठ पर धुलिया जंताल पूजा का इतिहास राजा-राजवाड़े के समय से जुड़ा बताया जाता है। रियासती काल में इस पूजा के आयोजन से संबंधित सभी खर्च राजकोष से वहन किए जाते थे। देश की आजादी के बाद भी इस पारंपरिक पूजा का आयोजन जारी रहा और वर्तमान में इसके आयोजन में राज्य सरकार की ओर से सहयोग किया जाता है।
इस वर्ष भी खरसावां अंचल कार्यालय की ओर से पूजा के आयोजन के लिए 25 हजार रुपये खर्च किए गए। इससे इस पारंपरिक धार्मिक आयोजन को प्रशासनिक स्तर पर मिलने वाले सहयोग का भी पता चलता है।
