खरसावां के डंगलटांड में झुमर गीतों पर रातभर झूमे
दर्शक, चुमकी रानी की प्रस्तुति ने बांधा समां, गीतों की धुन पर गूंजती
रही तालियां, पारंपरिक लोकसंगीत ने बिखेरी सांस्कृतिक छटा,
Kharsawan
खरसावां प्रखंड के डंगलटांड गांव में मां लक्ष्मी पूजा के अवसर पर देर रात भव्य झुमर कार्यक्रम का आयोजन किया गया। पारंपरिक लोकगीतों और मनमोहक संगीत से सजी इस सांस्कृतिक संध्या में पुरुलिया की प्रसिद्ध गायिका चुमकी रानी ने अपनी टीम के साथ ऐसा समां बांधा कि पूरा माहौल उत्सवमय हो उठा। झुमर की मधुर धुनों पर दर्शक देर रात तक झूमते रहे। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में ग्रामीणों और संगीत प्रेमियों की भागीदारी रही। कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक वंदना गीत के साथ हुआ। इसके बाद गायिका चुमकी रानी और उनकी टीम ने एक के बाद एक लोकप्रिय झुमर गीत प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी सुरीली आवाज, लोकसंगीत की पारंपरिक शैली और कलाकारों की आकर्षक प्रस्तुति ने कार्यक्रम में चार चांद लगा दिए। जैसे-जैसे कार्यक्रम आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे दर्शकों का उत्साह भी बढ़ता गया। गीतों की धुन पर लोग तालियां बजाकर कलाकारों का उत्साहवर्धन करते रहे।

बिहा, सोहराय और करम गीतों ने बांधा समां
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण बिहा, सोहराय और करम से जुड़े पारंपरिक लोकगीत रहे। इन गीतों में झारखंड और आसपास के क्षेत्रों की लोकपरंपरा, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिली। चुमकी रानी ने अपनी प्रस्तुति के दौरान दर्शकों की फरमाइश का भी ख्याल रखा और कई लोकप्रिय गीत सुनाकर लोगों का मनोरंजन किया। बिहा कोरे रे बंधु होयेछी पोर…, आइरे तुय आइरे, तोर भालो बासा कांदछे घोरे… तथा ओ तुंय भालो बासी रे, किने दिबो बनारसी साड़ी… जैसे गीतों पर दर्शकों ने जमकर तालियां बजाईं। इन गीतों की धुन और लय ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। खासकर पारंपरिक झुमर गीतों की प्रस्तुति पर दर्शकों में विशेष उत्साह देखने को मिला।
लोकगीतों ने जीवंत की क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत
चुमकी रानी की गायकी के साथ उनकी टीम के कलाकारों ने भी अपनी प्रस्तुति से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। पारंपरिक झुमर की लय, लोकधुनों की मिठास और गीतों की भावपूर्ण प्रस्तुति ने डंगलटांड की रात को यादगार बना दिया। कार्यक्रम के दौरान लोकसंगीत के प्रति लोगों का लगाव स्पष्ट रूप से नजर आया। युवा से लेकर बुजुर्ग तक लोकगीतों का आनंद लेते रहे। झुमर केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक विरासत को सहेजने का महत्वपूर्ण जरिया भी है। बिहा, सोहराय और करम जैसे अवसरों से जुड़े गीत ग्रामीण जीवन, सामाजिक रिश्तों और लोकआस्थाओं को स्वर देते हैं। ऐसे आयोजनों से नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर मिलता है और स्थानीय लोककलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच भी मिलता है।
धार्मिक उत्सव के साथ सांस्कृतिक उल्लास
मां लक्ष्मी पूजा के अवसर पर आयोजित इस झुमर कार्यक्रम ने धार्मिक आस्था के साथ सांस्कृतिक उल्लास का भी वातावरण तैयार किया। पूजा के उत्सवी माहौल में लोकगीतों की प्रस्तुति ने ग्रामीणों की खुशियों को दोगुना कर दिया। देर रात तक चले इस कार्यक्रम में दर्शक पारंपरिक संगीत का आनंद लेते रहे। डंगलटांड में आयोजित झुमर कार्यक्रम ने एक बार फिर क्षेत्र की समृद्ध लोकसंगीत परंपरा की जीवंत झलक पेश की। गायिका चुमकी रानी और उनकी टीम की प्रस्तुति दर्शकों के लिए खास आकर्षण रही। लोकगीतों की गूंज और तालियों की आवाज के बीच यह सांस्कृतिक संध्या गांव के लोगों के लिए यादगार बन गई।
