खरसावां में हूल दिवस पर वीर शहीदों को किया नमन,
”खरसावां गोलीकांड के गुमनाम अमर शहीद” पुस्तक का विमोचन,
अधिकारों की सुरक्षा समाज के लिए सर्वाेपरि-देवेन्द्रनाथ चंपिया,
kharsawan
खरसावां में हूल दिवस पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया। साथ ही खरसावां शहीद पार्क में खरसावां के वीर शहीदों को नमन करते हुए 1 जनवरी 1948 को खरसावां में हुए ”खरसावां गोलीकांड के गुमनाम अमर शहीद” पुस्तक का विमोचन, किया गया। सिद्धू-कान्हू ने आदिवासियों के ,जल, जंगल, जमीन, और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए संथाल हूल (विद्रोह) के रूप में सशस्त्र क्रांति की थी। आदिवासियों की पहचान, स्वाभिमान और हक की इस लड़ाई को याद करते हुए सिद्धू-कान्हू और ओत गुरू कोल लाकों बोदरा आदि के चित्र में पर माल्यार्पण कर श्रद्वाजंलि दी गई। इसको अपनी माटी और संस्कृति की रक्षा का प्रतीक बताया है। वही खरसावां सामुदायिक भवन में एक सभा को संबोधित करते हुए बिहार विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष देवेन्द्र नाथ चंपिया ने कहा कि अंग्रेजों के खिलाफ शंखनाद करने वाले सिद्धू और कान्हू केवल आदिवासी समाज के नायक नहीं थे, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा स्रोत थे। उनके द्वारा लड़ी गई इस लड़ाई का मुख्य उद्देश्य शोषितों को उनके हक दिलाना था। उन्होने कहा कि जल, जंगल, जमीन की रक्षा और आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा आज भी समाज के लिए सर्वाेपरि है। सीएनटी एसपीटी एक्ट जैसे कानूनों और पारंपरिक सरना धर्म की रक्षा के लिए उनके आदर्शों पर चलना जरूरी है। आदिवासी नायकों के इस संघर्ष की याद में प्रतिवर्ष 30 जून को हूल दिवस (क्रांति दिवस) पूरे उल्लास के साथ मनाया जाता है। इसके अलावे कई वक्ताओं ने संबोधित किया।

वीर स्वतंत्रता सेनानियों का संघर्ष ही हमारी पहचान- बहादुर उरांव
पूर्व विधायक बहादुर उरांव ने आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि सन 1855 में झारखंड के संथाल परगना में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हजारो आदिवासियों ने बिगुल फूंका था। ये लड़ाई संथाल के आदिवासियों ने हक और अस्मिता की लड़ाई छेड़ी थी। जिसपर सैकड़ों आदिवासी शहीद हुए थे। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ यह पहला स्वतंत्रता संग्राम था। संथाल विद्रोह का नेतृत्व करते हुए सिदो-कान्हू ने करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो का नारा दिया था। उन्होने कहा कि हमारे वीर स्वतंत्रता सेनानियों का संघर्ष ही हमारी पहचान है, उनका बलिदान ही हमारी शक्ति है। अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए हमारे वीर ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, लेकिन अन्याय के सामने वे कभी झुके नहीं।

ये थै मौजूद
बिहार विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष देवेन्द्र नाथ चंपिया, पूर्व विधायक बहादुर उरांव, बीडीओ साधु चरण देवगम, डॉ शिवचरण हांसदा, मंगल सिंह सोय, तिलक बारी, मुन्ना सोय, सन्नी सिंकू, दिनेश चन्द्र सोय, चन्द्रमोहन विरूवा, राम चन्द्र सोय, डीबार डॉगिल, लखिन्द्र भूमिज, ग्राम प्रधान खालिद खान, बाबुराम सोय, नरेन्द्र जिसूई, धमेन्द्र उरावं, सुखराम सोय, गोपीनाथ सोय, मंजू बोदरा आदि मौजूद थे।
