जिले के ओड़िया समुदाय में कार्तिक माह के दौरान मनाया जाने वाला पवित्र पर्व ‘बईतो बंदाणो’ क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक बन चुका पहचान,
Seraikella
सरायकेला।सरायकेला-खरसावां जिले के ओड़िया भाषी समुदाय में कार्तिक माह के दौरान मनाया जाने वाला पवित्र पर्व ‘बईतो बंदाणो’ इन दिनों क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। पूरे माह भर इस पर्व के दौरान सैकड़ों महिलाएं प्रतिदिन प्रातःकाल नदी तट पर स्नान कर भगवान श्री जगन्नाथ के विशेष स्वरूप राई-दामोदर की आराधना करती हैं। धूप, दीप और बालुका पूजा की परंपरा सदियों से यहां की जीवन-धारा से जुड़ी हुई है, जिसे समाज में पवित्रता, निष्ठा और स्त्री श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है।किन्तु इस वर्ष उत्सव की शुरुआत से ही घाटों की सफाई न होने को लेकर स्थानीय ओड़िया समाज में गहरा असंतोष व्याप्त है।

समाजसेवी कार्तिक परीक्षा ने बताया कि चार दिन पूर्व ही प्रशासन को घाटों की साफ-सफाई के लिए लिखित सूचना दी गई थी, परंतु अब तक किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं हुई है। उनका कहना है कि ‘बईतो बंदाणो’ केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि ओड़िया संस्कृति और परंपरा की आत्मा है। ऐसे में इसकी सम्मानजनक आयोजन की जिम्मेदारी प्रशासन और सरकार की होनी चाहिए।कार्तिक परीक्षा ने यह भी कहा कि स्वतंत्र राज्य सरायकेला के विलय के समय हुए समझौते में यह उल्लेख था कि राज्य सरकार यहां की स्थानीय संस्कृति और परंपराओं की रक्षा करेगी। यह केवल नैतिक नहीं बल्कि संवैधानिक दायित्व भी है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब छठ पूजा से पहले घाटों की बड़े पैमाने पर सफाई होती है, तो ओड़िया समाज के इस महत्वपूर्ण पर्व के दौरान घाटों को क्यों अनदेखा किया जा रहा है? उनका आग्रह है कि जैसे छठ घाटों की साफ-सफाई प्रत्येक वर्ष होती है, वैसे ही ‘बईतो बंदाणो’ पर्व के दौरान भी नदी तटों की स्वच्छता सुनिश्चित की जाए।स्थानीय नागरिकों का कहना है कि इस उत्सव में प्रतिदिन सैकड़ों महिलाएं बालुका पूजा करती हैं, जिससे पर्यावरण और धार्मिक आस्था का गहरा संबंध है। सरकार और प्रशासन से अपेक्षा की जा रही है कि इस सांस्कृतिक धरोहर की मर्यादा बनाए रखने में अब लापरवाही न की जाए और त्वरित कार्रवाई कर घाटों की सफाई कराई जाए।
