आदिवासियों के पास सबसे अधिक जमीन रहते हुए भी आखिर
आदिवासी क्यों गरीबी की जिंदगी जीने को विवश हैं-बिरसा सोय,
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झारखण्ड वृहद झारखण्ड मोर्चा के केन्द्रीय अध्यक्ष बिरसा सोय ने प्रेस ब्यान जारी कर कहा कि भारत में आदिवासियों के पास कुल भूमि के नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों (एनएसएस 77वां दौर, 2019) के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में कुल भूमि का लगभग 14.1 प्रतिशत है। वन अधिकार अधिनियम के तहत 2023 तक करीब 1.8 करोड़ एकड़ भूमि वितरित की गई। इसके बावजूद आज देश में आर्थिक एवं शैक्षणिक दृष्टिकोण से सबसे अधिक गरीबी आदिवासी समाज के लोगों में ही क्यों है?। यह अपने आप में बहुत बड़ा चिंता का विषय है। जबकि विश्व बैंक के एक हालिया अध्ययन से इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि आदिवासी अपने समुदायों को बनाए रखने और चुनौतियों के अनुकूल ढलने के लिए अपने पूर्वजों के ज्ञान, सांस्कृतिक प्रथाओं और मज़बूत शासन प्रणालियों पर ऐतिहासिक रूप से निर्भर रहे हैं। सुरक्षित भूमि अधिकार और बुनियादी सेवाओं तक पहुंच, उनके लचीलेपन और विश्व के पारिस्थितिक तंत्रों के निरंतर प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण हैं। उन्होने कहा कि विश्व बैंक दुनिया भर की सरकारों, आदिवासियों और विकास साझेदारों के साथ मिलकर काम करता है। ताकि विकास समाधान और सभी के लिए रहने योग्य ग्रह प्राप्त करने में भागीदार के रूप में मूल निवासियों के अद्वितीय दृष्टिकोण, ज्ञान और योगदान को मान्यता दी जा सके और उनका समर्थन किया जा सके।
आदिवासी समुदायों की गरीबी के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।
1. शिक्षा की कमी- आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा की पहुंच कम होने से लोगों को रोजगार के अवसर नहीं मिल पाते हैं।
2. आर्थिक संसाधनों की कमी- आदिवासी समुदायों में अक्सर आर्थिक संसाधनों की कमी होती है, जिससे वे अपने बच्चों को शिक्षा नहीं दे पाते हैं।
3. भूमि अधिकारों की कमी- आदिवासी समुदायों को अक्सर अपनी जमीन पर अधिकार नहीं मिल पाता है, जिससे वे अपनी आजीविका नहीं चला पाते हैं।
4. स्वास्थ्य सेवाओं की कमी- आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी होने से लोगों को उचित इलाज नहीं मिल पाता है।
5. सरकारी योजनाओं का अभाव- आदिवासी समुदायों तक सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं पहुंच पाता है, जिससे वे गरीबी से नहीं उभर पाते हैं।
6. सामाजिक अलगाव- आदिवासी समुदायों को अक्सर सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ता है, जिससे वे मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाते हैं।
इन कारणों को समझने से हमें आदिवासी समुदायों की गरीबी के समाधान के लिए काम करने में मदद मिल सकती है।
