खरसावां के हरिभंजा में 252 वर्षो से हो रही है एतिहासिक
रथयात्रा, पुरानी परंपराओं के साथ निकलेगी रथयात्रा, इस बार नए रथ पर
सवार होगे प्रभु जगन्नाथ, भाई बलभद्र एवं बहन सुभद्रा
kharsawan प्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा विष्व विख्यात है। पुरी के तर्ज पर खरसावां सरायकेला में भी भव्य रूप से प्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है। पारंपारिक रीति रीवाज के तहत निकाली जाने वाली रथयात्रा को प्रभु जगन्नाथ को कलयुग के पालनहार श्रीहरि विष्णु का रथ भी माना जाता है। रथयात्रा प्रभु के प्रति भक्त के आस्था मान्यता व पंरपराओं की यात्रा है। जो प्रचीनकाल से चली आ रही है। रथ यात्रा का प्रसंग रूकदपुराण, पदमपुराण, पुस्षोतम, माहास्मय, वृहद्वागवतामृत, व गीतागोविदम में भी वर्णित है। वार्षिक रथयात्रा एक ऐसा मौका है, जब प्रभु भक्तों को दर्शन देने के लिए मंदिर से बाहर निकलते है। प्रभु के दर्शन से भक्तो के सारे पाप कट जाते है। रथ यात्रा एक ऐसा त्योहार है जब प्रभु जगन्नाथ अपने बडे भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा के साथ मंदिर को छोड कर भक्तो को दर्शन देने के लिए बाहार निकलते है। खरसावां के हरिभंजा में प्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा निकलती है। यहां की रथ यात्रा 252 साल से भी ज्यादा पुरानी है।

सिंहदेव वंश 17वीं सदी में कर रही प्रभु जगन्नाथ की पूजा अर्चना
खरसावां के हरिभंजा में सिंहदेव वंश के जमीनदारों ने 17वीं सदी में प्रभु जगन्नाथ के मंदिर की स्थापना कर पूजा अर्चना शुरू की थी। साल भर यहां चतुर्था मूर्ति प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा के साथ-साथ सुदर्शन की पूजा होती है। वार्षिक रथ यात्रा समेत सभी धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन ओडिशा के पुरी की तर्ज पर होता है। रथ यात्रा को देखने के लिए काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। रथ यात्रा में सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार यहां रथ निकलती है। हरिभंजा रथयात्रा के सभी रश्मे पुरी के तर्ज पर किया जाता है। रथयात्रा में कई पुरानी परंपराओं का निर्वाहन होता है।

नये रथ की सवारी करेगे प्रभु जगन्नाथ
खरसावां के हरिभंजा में इस वर्ष भगवान जगन्नाथ भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ नये रथ की सवारी कर गुंडिचा मंदिर (मौसी बाड़ी) पहुंचेंगे। नये रथ का निर्माण कार्य पूर्ण हो चुका है। नये रथ का रंग रोगन जारी है। ओड़िशा के कारीगरों द्वारा नये रथ का निर्माण किया जा रहा है। हरिभंजा में प्रभु जगन्नाथ के रथ का निर्माण कार्य अक्षय तृतीया के शुभ दिन से शुरू हुआ है। विधिवत पूजा-अर्चना करने के बाद कारीगरों द्वारा रथ का निर्माण कार्य शुरु किया गया। इस वर्ष रथ को काफी आकर्षक बनाया जा रहा है। छह पहिये वाले इस रथ में अलग-अलग कलाकृतियां रेखांकित की जा रही है। इसके अलावा रथ में विभिन्न विग्रहों की प्रतिमूर्तियां भी उकेरी जा रही है। रथ के गुंबद को भी आकर्षक रूप दिया जायेगा। इसके लिए पुरी से विशेष कपड़े मंगवाएं जायेंगे। रथ का निर्माण पूरा होने के बाद इसकी रंगाई-पुताई कर इसे और भी आकर्षक रूप दिया जा रहा है।
रथ यात्रा के दिन नए रथ की जायेगी प्रतिष्ठा
हरिभंजा में रथ यात्रा के दिन नए रथ की प्रतिष्ठा की जायेगी। इसके बाद प्रभु जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होंगे। हजारों श्रद्धालुओं द्वारा रथ को खींचकर गुंडिचा मंदिर तक पहुंचाया जायेगा। इस वर्ष प्रभु जगन्नाथ की देव स्नान की गई। देव स्नान के दिन 108 कलश पानी से प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा व सुदर्शन के प्रतिमाओं का महास्नान कराया गया। इसके 15 दिनों के बाद प्रभु जगन्नाथ का नेत्रोत्सव सह नव यौवन दर्शन होगा। 27 जून को प्रभु जगन्नाथ, भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा के साथ नये रथ पर सवार हो कर गुंडिचा मंदिर (मौसीबाड़ी) के लिये रवाना होंगे।
252 साल पुरानी है हरिभंजा की रथ यात्रा
खरसावां के पूर्व प्रमुख सह गांव के जमींदार विद्या विनोद बताते है कि हरिभंजा में प्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा पिछले 252 साल से भी अधिक पुरानी है। उनके पूर्वजों ने 17 वीं सदी में प्रभु जगन्नाथ के मंदिर की स्थापना कर पूजा-अर्चना शुरु की थी। साल भर यहां चतुर्था मूर्ति प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा व सुदर्शन की पूजा होती है. इसके अलावा पूरे उत्साव के साथ वार्षिक रथ यात्रा का आयोजन होता है।
हरिभंजा का जगन्नाथ मंदिर आकर्षण का केंद्र
हरिभंजा का जगन्नाथ मंदिर पूरे जिले के लोगों के लिये आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहां वर्ष 2015 में मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया था। मंदिर को करीब से देखने व निहारने के लिये सालों भर यहां श्रद्धालुओं का आवागमन होता है। मंदिर के बाह्य दिवारों में भगवान विष्णु के दस अवतार की अलग-अलग मूर्तियां लगायी गयी है। जबकि मंदिर के अंदर 10 दिगपाल, जय-विजय समेत कई मूर्तियां बनायी गयी है। इसके मुख्य गेट पर विश्व प्रसिद्ध कोणार्क का सूर्य चक्र बनाया गया है। यह सूर्य चक्र लोगों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करता है।
पारंपरिक छेरा पोंहरा रश्म के बाद निकलती है रथ यात्रा
हरिभंजा में पुरी की तर्ज पर पारंपरिक छेरा पोंहरा रश्म अदायगी के बाद ही प्रभु जगन्नाथ की रथ निकलती है। गांव के जमीनदार विद्या विनोद सिंहदेव सड़क पर चंदन छिडक कर झाडू लगाते हैं। इसके बाद ही प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र एवं बहन सुभद्रा की प्रतिमा मंदिर से पोहंडी कर (झुलाते हुए) श्रीमंदिर से रथ के ऊपर तक ले जाया जाता है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ एवं बलभद्र के लिए विशेष तौर पर तैयार किये गये मुकुट पहनाये जाते हैं, जिसे रथ पर विराजमान होने के बाद ही उतार कर भक्तों में बांट दिया जाता है।
रथ के आगे चलती है संकीर्तन एवं घंटवाल दल
हरिभंजा में रथ यात्रा के दौरान पुरी की तर्ज पर रथ के आगे-आगे 60 सदस्यीय संकीर्तन एवं घंटवाली दल भजन-कीर्तन करते हुए चलते हैं। यहां रथ यात्रा पर खासतौर से ओडिशा से संकीर्तन एवं घंटवाल दल को लाया जाता है। यहां के रथ यात्रा के आकर्षण का यह बड़ा केंद्र होता है।
मौसीबाड़ी में होती है भंडारे
प्रभु जगन्नाथ के मौसी बाड़ी में रहने के दौरान आठ दिनों तक भंडारे का आयोजन होता है। रात में खीर, खिचड़ी और सब्जी का प्रसाद चढ़ा कर भक्तों में बांटा जाता है. यहां प्रसाद लेने के लिए हर रोज करीब पांच सौ लोग पहुंचते हैं।
रथयात्रा पर होने वाले धार्मिक अनुष्ठान
Û 26 जून उमायात्रा एवं भक्तों के लिए महाप्रभु का नवयौवन दर्षन।
Û 27 जून रथयात्रा का शुभारंभ गंुडिचा मंदिर से अपनी बहन सुभद्रा एवं बडे भाई बलभद्र के साथ मौसीबाडी स्थित मंदिर के लिए प्रस्थान करेगे।
Û 1 जुलाई को तारणी व्रत व हेरा पंचमी पर मां लक्ष्मी द्वारा रथ भगिनी का निवार्हन होगा।
Û 5 जुलाई बाउडा रथयात्रा के साथ महाप्रभु मौसीबाडी स्थित मंदिर से गंुडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करेगें।
यहॉ निकाली जाती है रथयात्रा
खरसावां, हरिभंजा, बंदोलोहर, गालुडीह, दलायकेला, जोजोकुडमा, पोटोबेडा, सीनी।
पुजा परंपराओं के इनका है महत्वपूर्ण योगदान
हरिभंजा रथयात्रा के पुजा अर्चना के निर्वाहन मे खरसावां के पूर्व प्रमुख सह गांव के जमींदार विद्या विनोद सिंहदेव, संजय सिंहदेव, राजेश सिंहदेव, पृथ्वीराज सिंहदेव, राना सिंहदेव, मुकेश सिंहदेव, प्रकाश सिंदेव, रथयात्रा के परंपराओं को निभा रहे है। इसके अलावे पूरे वर्ष की मुख्य पुजारी भरत तिपाठी, सहायक पुजारी प्रदीप दास, जगन्नाथ तिपाठी, धनंजय प्रताप सिंहदेव, तरूण कुमार पाणी, पंकज कुमार पाणी, अन्नथ कुमार पाणी, बुल्लू कुंवर सहित कईयों का महत्वपूर्ण योगदान है।
