खरसावां में श्रीमद्भागवत महापुराण कथा में श्रद्धालुओं ने
सुना राजकुमारी रुक्मिणी के प्रेम और विवाह की रोमांचक कथा, रुक्मणी विवाह ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति का प्रतीक-रसराज महाराज
kharsawan
खरसावां के बेहरासाई सामुदायिक भवन में रामकृष्ण कथा समिति के द्वारा आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के छठा दिन राजकुमारी रुक्मिणी के प्रेम और विवाह की रोमांचक कथा सुनने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड उमड पडी। सात दिवसीय इस धार्मिक आयोजन में बडी संख्या में लोग शामिल होकर कथा श्रवण कर रहे हैं और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं। कथावाचक रजत रसराज महाराज अपने प्रवचन में कहा कि रुक्मणी विवाह का प्रसंग केवल एक प्रेम कथा नहीं है, बल्कि यह ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति का प्रतीक है। रुक्मिणी, जो स्वयं लक्ष्मीजी थीं, नारायण (श्रीकृष्ण) से दूर नहीं रह सकती थीं, और यह कथा उनके दिव्य मिलन को दर्शाती है। उन्होने कहा कि रुक्मणी विवाह (रुक्मिणी कल्याणम) भागवत पुराण में वर्णित श्रीकृष्ण और विदर्भ राजकुमारी रुक्मिणी के प्रेम और विवाह की एक रोमांचक कथा है। रुक्मिणी, जिन्हें लक्ष्मीजी का अवतार माना जाता है, ने श्रीकृष्ण के गुणों पर मोहित होकर उन्हें मन ही मन पति मान लिया था। रुक्मिणी के भाई रुक्मी के विरोध के बावजूद, रुक्मिणी के निमंत्रण पर श्री कृष्ण ने उनका हरण कर विधिवत विवाह किया।

रुक्मणी विवाह कथा का प्रसंग और व्याख्या
विवाह का प्रस्ताव और विरोध- रुक्मिणी विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री थीं। जब रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण की वीरता की कथाएं सुनीं, तो उन्होंने श्रीकृष्ण से विवाह करने का निश्चय किया। लेकिन, रुक्मिणी का भाई रुक्मी, जो शिशुपाल का मित्र था, इस विवाह के खिलाफ था और रुक्मिणी का विवाह जबरदस्ती शिशुपाल से करना चाहता था।
प्रेम पत्र (संदेश)- इस संकटपूर्ण स्थिति में, रुक्मिणी ने एक ब्राह्मण के माध्यम से श्रीकृष्ण को एक प्रेम संदेश भेजा। इस संदेश में उन्होंने अपने प्रेम की अभिव्यक्ति की और श्री कृष्ण से उन्हें रुक्मी के चंगुल से छुड़ाने का आग्रह किया।
हरम से अपहरण- रुक्मिणी के संदेश को पाकर, श्रीकृष्ण द्वारका से विदर्भ पहुंचे। जब रुक्मिणी अंबा माता के मंदिर से बाहर आ रही थीं, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने रथ में बैठा लिया और द्वारका की ओर चल पड़े। यह एक नाटकीय घटना थी, जिसे राक्षस विवाह की तरह माना जाता है।
युद्ध और विवाह-रुक्मी और उसके सहयोगियों ने कृष्ण का पीछा किया, लेकिन बलराम जी ने रुक्मी की सेना को हराकर उसे परास्त कर दिया। इसके बाद, श्रीकृष्ण और रुक्मिणी ने द्वारका में विधिपूर्वक विवाह किया और विवाह के बाद सभी ने खुशी मनाई।
