विश्व आदिवासी दिवस केवल उत्सव का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, अधिकारों और अस्तित्व की रक्षा का संकल्प दिवस है-सुशेन मार्डी
Seraikella
जन आंदोलन संघर्ष मोर्चा के महासचिव श्री सुशेन मार्डी ने एक प्रेस विज्ञाप्ति जारी करते हुए बताया कि 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस पर देश और दुनिया के आदिवासियों की गौरवपूर्ण जीवन शैली, संघर्ष और चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह दिन केवल उत्सव का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, अधिकारों और अस्तित्व की रक्षा का संकल्प दिवस है।
श्री मार्डी ने कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति-आधारित जीवन दर्शन का अनुयायी है। उनका जीवन जंगल, जमीन और जल से गहराई से जुड़ा है। उनके रीति-रिवाज, पर्व, गीत, नृत्य और भाषाएं केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का अद्वितीय उदाहरण हैं। आदिवासी जीवन शैली सामूहिकता, समानता और श्रम के सम्मान पर आधारित है, जहाँ संसाधनों का दोहन नहीं, बल्कि संरक्षण और साझा उपयोग किया जाता है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि औद्योगीकरण, खनन और अंधाधुंध विकास परियोजनाओं के कारण आदिवासी समाज अपनी परंपरागत जमीन और आजीविका से लगातार विस्थापित हो रहा है। उनकी भाषाएं और सांस्कृतिक पहचान खतरे में हैं। सरकारें और कॉर्पोरेट ताकतें अक्सर ‘विकास’ के नाम पर उनके संसाधनों पर कब्जा करती हैं, जबकि असली विकास तब होगा जब आदिवासियों के अधिकार और सहभागिता सुनिश्चित हों। श्री सुशेन मार्डी ने कहा कि आदिवासी समाज केवल पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक नहीं, बल्कि लोकतंत्र के सबसे मूलभूत सिद्धांत—जनभागीदारी—का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने मांग की कि—
1. संविधान की पाँचवीं और छठी अनुसूची के प्रावधानों को सख्ती से लागू किया जाए।
2. भूमि अधिग्रहण और खनन कार्यों में ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य हो।
3. आदिवासी भाषाओं और शिक्षा व्यवस्था को मातृभाषा आधारित बनाया जाए।
4. जंगल पर पारंपरिक अधिकारों को ‘वन अधिकार अधिनियम’ के तहत पूरी तरह लागू किया जाए।
श्री मार्डी ने स्पष्ट किया कि जन आंदोलन संघर्ष मोर्चा आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए हर स्तर पर संघर्ष करेगा। यह लड़ाई केवल आदिवासियों की नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज की है, क्योंकि प्रकृति और पर्यावरण का संतुलन तभी संभव है जब आदिवासी समाज अपनी जड़ों के साथ सुरक्षित और स्वाभिमान के साथ जी सके।
अंत में, उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे आदिवासी समाज की संघर्षगाथा और योगदान को समझें, उनकी संस्कृति का सम्मान करें, और उनके साथ खड़े हों। विश्व आदिवासी दिवस पर हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम उनके अधिकारों की रक्षा में अपनी भूमिका निभाएँ और उन्हें ‘विकास’ के नाम पर हाशिये पर न धकेला जाए।
