जयंती पर श्रद्धा भाव के साथ याद किए गए “ज्वेल ऑफ सरायकेला छऊ” स्वर्गीय राजकुमार सुवेंद्र नारायण सिंह देव
Seraikella
सरायकेला। कहते हैं कि श्रेष्ठ कलाकार की स्मृतियां और उनके योगदान उनके जाने के बाद भी सच्चे कलाकारों के दिल में जीवंत रहती है। कुछ इसी स्मृतियों को याद करते हुए ज्वेल ऑफ सरायकेला छऊ कहे जाने वाले स्वर्गीय राजकुमार सुवेंद्र नारायण सिंह देव 106वीं जयंती कलाकारों द्वारा पूरी श्रद्धा भाव के साथ मनाई गई। इस अवसर पर सरायकेला छऊ कलाकारों ने उनके चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए उन्हें नमन किया। साथ ही सरायकेला छऊ में उनके योगदान को याद करते हुए स्वर्गीय राजकुमार सुवेंद्र नारायण सिंह देव द्वारा तैयार की गई “हंस” नृत्य नाटिका की प्रस्तुति सरायकेला छऊ नृत्य शैली में की गई। सीनियर फेलोशिप अवार्ड रजतेन्दु कला निकेतन प्रमुख छऊ गुरु रजतेंदु रथ, गुरु कुसमी पटनायक, सीनियर फेलो गुरु निबारण महतो, सुप्रा, पूनम, लक्ष्मी अमीश, देवदास, थुंगरू मुखी, राम महतो, उदय कुमार, सुहाना सिंह देव सहित अन्य कलाकारों द्वारा उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

मझिया लाल साहेब के लिए चाचा ने तैयार कर दी थी मॉडर्न छऊ की दुनिया:-
लीजेंड ऑफ़ सरायकेला मॉडर्न छऊ के जनक माने जाने वाले कुंवर विजय प्रताप सिंह देव ने अपने भतीजे स्वर्गीय राजकुमार सुवेंद्र नारायण सिंह देव के लिए नवरस से भरी सरायकेला मॉडर्न छऊ की दुनिया तैयार कर दी थी। बताया जाता है कि इससे पूर्व सरायकेला छऊ नृत्य कला में सामरिक रस फरीखंडा की प्रधानता थी। परंतु रॉयल पैलेस सरायकेला में 6 फरवरी 1920 को जन्मे राजकुमार सुवेद्र नारायण सिंह देव के राज परिवार से कला के प्रति प्रेम को देखते हुए कुंवर विजय प्रताप सिंह देव ने अपने भतीजे राजकुमार सुवेंद्र नारायण सिंह देव के लिए नवरस की प्रधानता वाली सरायकेला मॉडर्न छऊ की एक दुनिया स्थापित कर दी। मझिया लाल साहेब के नाम से प्रसिद्ध रहे स्वर्गीय राजकुमार सुवेंद्र नारायण सिंह देव ने मात्र 6 वर्ष की आयु में सार्वजनिक रूप से आम जनता के बीच अपनी पहली प्रस्तुति “राम शोक” नृत्य की प्रस्तुति की थी। उनके कला जीवन सफर के बारे में मजेदार बात बताई जाती है कि उन्होंने किसी भी गुरु से विधिवत सरायकेला छऊ नृत्य कला की शिक्षा नहीं हासिल की थी। परंतु श्रेष्ठ प्रदर्शनों को देख वे भाव भंगिमा के साथ विशेष प्रदर्शन के लिए प्रसिद्ध रहे थे। उन्होंने “हंस” नामक नृत्य नाटिका की कोरियोग्राफी की। जिसे आज भी प्रस्तुत किया जाता है। उनके यादगार नृत्यों में मयूर, राधा कृष्ण, नाविक, सागर, चंद्रभागा, मारू माया, तांडव एवं दुर्गा आज भी याद किए जाते हैं। वर्ष 1937 में उन्होंने विशेष आमंत्रण पर कोलकाता में स्वर्गीय शरत चंद्र बोस के निवास की छत पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के समक्ष सरायकेला छऊ नृत्य राधा कृष्ण की प्रस्तुति दी थी। जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उनके नृत्य को देखकर कहा था “यू डांस ब्यूटीफुल”। इसके बाद रॉयल छऊ ट्रूप के साथ 1938 में वे यूरोपियन कंट्री पहुंच कर अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए प्रशंसा पाई थी। और 1941 में विशेष निमंत्रण पर उन्होंने कवि गुरु रविंद्र नाथ टैगोर के समक्ष शांतिनिकेतन में अपना प्रदर्शन कर भरपूर प्रशंसा पाई थी। भारतीय शास्त्रीय नृत्य में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है। मात्र 24 वर्ष की अल्प आयु सरायकेला की खरकाई नदी में तैरने के दौरान नदी में डूबने से उनकी मौत हो गई थी।
