कुचाई के सुदूरवर्ती पहाडी क्षेत्र स्थित रायसिंदरी में
पारंपरिक तरीके से मना 15 वां वनाधिकार पत्थरगाड़ी स्थापना दिवस,
जंगल के वास्तविक संरक्षक आदिवासी ही हैं-कालीचरण मुंडा
kuchai
कुचाई के सुदूरवर्ती पहाडी क्षेत्र स्थित रायसिंदरी मौजा में वन कानून के तहत पारंपरिक तरीके 15वां वनाधिकार पत्थरगाड़ी स्थापना दिवस मनाया गया। पारंपरिक नृत्य और गीत के तहत ग्रामीण पाहन सागर गागराई द्वारा सिरमारेन सिंगी वोंगा, आतेरेन आते ऐगा, ग्राम-देशैली, वन देवता एवं नागे-चाण्डियों को तीन सीम देकर विधिवत पूजा-पाठ किया।

पूजा के उपरांत रायसिंदरी खेल मैदान में ग्रामीण मुण्डा गोपाल सिंह मुण्डा की अध्यक्षता में आमसभा आयोजित की गई, जबकि संचालन दामु मुंडा ने किया। इस वनाधिकार पत्थरगाड़ी स्थापना दिवस कार्यक्रम में खूटी के सांसद कालीचरण मुंडा एवं खरसावां विधायक दशरथ गागराई भी शामिल हुए। मौके पर सांसद कालिचरण सिंह मुण्डा ने कहा कि जंगल के वास्तविक संरक्षक आदिवासी ही हैं। उन्होंने कहा कि जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए भगवान बिरसा मुण्डा ने अपना बलिदान दिया, जिसके परिणाम स्वरूप सीएनटी एक्ट 1908 लागू हुआ।

जबकि श्री गागराई ने कहा कि वे रायसिंदरी ग्राम के विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा कि जंगल अमृत के समान है, जो स्वच्छ वायु और जीवन प्रदान करता है। उन्होंने वनाधिकार कानून 2006 के समुचित उपयोग की अपील करते हुए कहा कि ग्रामसभा पेसा नियमावली के तहत अपने अधिकारों का क्रियान्वयन करे। साथ ही रायसिंदरी को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की दिशा में प्रयास करने की बात कही। वही आईसीएफजी के सोहन लाल कुम्हार ने जानकारी देते हुए बताया कि वर्ष 2010 में 145 वनाश्रितों को 762 एकड़ 71 डिसमिल भूमि पर व्यक्तिगत वनाधिकार प्रमाण-पत्र मिला तथा 29 दिसंबर 2020 को 3406 एकड़ 45 डिसमिल भूमि पर सामुदायिक वनाधिकार प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया। यह अधिकार वनाधिकार अधिनियम 2006 के तहत प्राप्त हुआ है। उन्होंने बताया कि 1964-65 के भू-सर्वेक्षण में इस मौजा को पूर्ण रूप से वनभूमि घोषित कर दिया गया था, जबकि पूर्व में यह राजस्व ग्राम था। वनाश्रितों ने वर्ष 2009 में एसडीएलसी सरायकेला में दावा प्रस्तुत किया था। वनाधिकार मिलने के बाद क्षेत्र में जंगल का घनत्व बढ़ा है और आज यह क्षेत्र घने एवं समृद्ध वन के रूप में विकसित हो चुका है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में यहां 15 टोले हैं और क्षेत्र में जलस्रोत कभी नहीं सूखते। वन क्षेत्र में बंदर, हनुमान, कोटरा, खरगोश, मोर और सियार जैसे वन्य प्राणी भी दिखाई देते हैं। ग्रामीण बिना वन विभाग की सीधी सहायता के जंगलों की देखरेख कर रहे हैं। जिससे वनोपज में वृद्धि हुई है। यहां जैविक हल्दी की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। जिससे प्रत्येक परिवार को सालाना 20 से 30 हजार रुपये तक की आमदनी हो रही है। सभा को मुखिया करम सिंह मुण्डा, धर्मेन्द्र सिंह मुण्डा सहित अन्य वक्ताओं ने जल-जंगल-जमीन की रक्षा और अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि रायसिंदरी का विकास संघर्ष और पूर्वजों के बलिदान का परिणाम है। इस दौरान मुख्य रूप से फागु मुण्डा, लाल सिंह सोय, चंदन वागची, कारू मुण्डा, मेघनाथ सरदार, श्यामलाल सोय, रूपसिंह मुंडा, सागर मुण्डा, मंगल सिंह मुण्डा, नोरेश मुण्डा, मानसिंह मुण्डा, राहुल सोय, बसंती गागराई, मुन्ना सोय, बुधराम मुण्डा, देवेन्द्र सरदार, संग्राम मुण्डा, अरुणा जामुदा, सुनिता कुमारी, भुवनेश्वरी मुण्डा, सुखराम हेम्ब्रम आदि ग्रामीण उपस्थित थे।
