खरसावां-कुचाई में बसंत की दस्तक के साथ खिले
पलाश के फूलः करा रहे होली के आगमन का अहसास, औषधीय
गुणों से भरपूर, होली के प्राकृतिक रंग के रूप में इस्तेमाल,
kharsawan-kuchai खरसावां-कुचाई क्षेत्र में बसंत ऋतु की आमद के साथ पलाश के पेड़ों पर केसरिया रंग के फूल खिल गए हैं। बसंत का राजा कहे जाने वाले ये फूल क्षेत्र के जंगलों में बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं। ग्रामीण परिसर में पलाश के फूलों की बहार से होलिकोत्सव आगाज का संदेश मिल जाता है। होली पर ग्रामीण इलाकों में पलाश के फूलों से रंगों को तैयार किए जाते है। फागुन माह में पतझड़ के बाद जंगलों में सर्वत्र वीरानी छाई रहती जंगलों में अधिकतर वृक्ष सूखे दिखाई देते हैं। स्थानीय लोग इन्हें खांकरा के नाम से जानते हैं। पलाश के फूल न केवल देखने में सुंदर हैं, बल्कि औषधीय गुणों से भी भरपूर हैं। इनका उपयोग हर्बल रंगों के रूप में भी किया जाता है। आफरों का तालाब जंगल और आसपास के गांवों में इन दिनों पलाश के पेड़ फूलों से लदे हुए हैं। भारतीय साहित्य और संस्कृति में विशेष स्थान रखने वाले इस वृक्ष का स्वास्थ्य से गहरा नाता है। पारंपरिक रूप से होली के त्योहार में इन फूलों से प्राकृतिक रंग बनाया जाता था। यह रंग त्वचा के लिए पूरी तरह सुरक्षित होता है। सौंदर्य वर्धक गुणों के कारण इसका उपयोग प्राचीन काल से होता आ रहा है। गर्मी के मौसम में भी पलाश अपनी खूबसूरत छटा बिखेरता है। वृक्षों के बीच प्ले आफ द फारेस्ट के रूप में पहचाने जाने वाले प्लांट के फूल अपनी सुंदरता बिखेर रहे। होली का आगाज दिलाने वाले पलाश के फूल देखकर ग्रामीण इलाकों में होली मनाने की तैयारी शुरू हो जाती है। पलाश के फूलों से शरबत व होली का प्राकृतिक रंग भी बनाया जाता हैं। इतना ही नहीं इन फूलों के अर्क से औषधि भी तैयार की जाती है। आयुर्वेद में पलाश के पंचांग को उपयोगी वनस्पति का भी दर्जा प्राप्त है।