मूलनिवासी कर्मचारी कल्याण महासंघ ने टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (टेट) के विरोध मे राष्ट्रपति के नाम डीईओ को सौपा ज्ञापंन, टेट लागू से पूर्व नियुक्त शिक्षकों के सेवा-सुरक्षा एवं संवैधानिक अधिकारों की मांग,
Kharsawan
टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (टेट) के लागू होने से पूर्व नियुक्त प्राथमिक एवं जूनियर हाई स्कूल शिक्षकों के सेवा-सुरक्षा एवं संवैधानिक अधिकारों की मांग पर मूलनिवासी कर्मचारी कल्याण महासंघ (एमकेकेएम) ने देश के राष्ट्रपति के नाम पर सरायकेला खरसावां जिला शिक्षा अधिकारी को एक ज्ञापन सौपा। राष्ट्रपति के नाम डीईओ को सौपे मे कहा गया कि कर्मचारी कल्याण महासंघ शिक्षक एवं कर्मचारी हितों के लिए संविधानसम्मत ढंग से कार्यरत एक सामाजिक संगठन है। आपके समक्ष अत्यंत विनम्रता एवं उत्तरदायित्व के साथ कहना है कि हमारा उद्देश्य न तो शिक्षा की गुणवता के पक्ष का ही माननीय सर्वोत्तम न्यायालय के किसी निर्णय पर असहमति व्यक्त करना, बल्कि सेवा में कार्यरत शिक्षकों के समक्ष उत्पत्र व्यावहारिक, मानसिक एवं संविधानिक समस्याओं की ओर प्रशासन का थान आकृष्ट करना है।

यह एक निर्वावाद तथ्य है कि राज्य के प्राथमिक एवं जूनियर हाई स्कूलों में कार्यरत हत्यारों शिक्षकों की नियुक्ति टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (टेट) लागु होने से पूर्व हुई थी। उस समय सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम शैक्षिक एवं आवसायिक योग्यताएँ जैसे बीटीसी, डीईडी, जेबीटी एवं बीईडी थी। इन्हीं योग्यताओं आधार पर, ताकालीन नियमों एवं चयन प्रक्रिया का पूर्ण पालन करते हुए शिक्षकों की नियुक्ति की गई। उस कालखंड में टेट नाम का कोई पात्रता परीक्षा अस्तित्व में नहीं थी। वर्तमान में सेवा के मध्य टेट को अनिवार्य किए जाने से शिक्षकों के समक्ष गंभीर संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है। वर्षों सेवा देने के पश्चात अचानक उनकी सेवा-सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न, मानसिक तनाव, सामाजिक असुरक्षा तथा आजीविका को लेकर अनिश्चितता उत्पन्न हो रही है। इसका सीधा प्रभाव न केवल शिक्षक के मनोबल पर पड़ रहा है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की स्थिरता पर भी पड़ रहा है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अंजुमन इशात-ए-तालीम ट्रस्ट बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य (केस नंबर 2025 आईएनएससी 1063, निर्णय दिनांक 01 सितंबर 2025) में शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से टेट को महत्वपूर्ण माना है। महासंघ इस निर्णय का पूर्ण सम्मान करता है। किंतु यह भी निवेदन है कि इस निर्णय की मंशा शिक्षा सुधार है, न कि वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों को दंडित करना या उन्हें असुरक्षित स्थिति में डालना। किसी भी न्यायिक निर्णय का क्रियान्वयन मानवीय, व्यावहारिक एवं संतुलित दृष्टिकोण के साथ किया जाना आवश्यक है। भारतीय संविधान शिक्षक को केवल एक कर्मचारी नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया का अभिन्न अंग मानता है। संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार प्रदान करता है, अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर सुनिश्चित करता है, अनुच्छेद 21 गरिमामय जीवन का अधिकार देता है तथा अनुच्छेद 46 राज्य को सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से वंचित वर्गों के संरक्षण का दायित्व सौंपता है। ऐसे में सेवा के दौरान नए मानदंड लागू कर शिक्षक के भविष्य को अनिश्चित करना संविधान की भावना के अनुरूप प्रतीत नहीं होता। महासंघ का यह स्पष्ट मत है कि शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षक का भविष्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। भय, असुरक्षा और अनिश्चितता के वातावरण में कार्यरत शिक्षक से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा नहीं की जा सकती। यदि शिक्षक सुरक्षित, सम्मानित और मानसिक रूप से सशक्त होगा, तभी वह शिक्षा के उद्देश्य को पूर्ण कर सकेगा। महासंघ सविनय आग्रह करता है कि टेट लागू होने से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को पूर्ण सेवा-सुरक्षा प्रदान की जाए, उनकी सेवा-अनुभव एवं प्रशिक्षण को पात्रता के रूप में मान्यता दी जाए तथा किसी भी प्रकार की दंडात्मक या सेवा-समाप्ति की कार्रवाई न की जाए। साथ ही शिक्षक संगठनों से संवाद कर इस विषय में एक स्पष्ट, व्यावहारिक एवं मानवीय शासनादेश जारी किया जाए। महोदय से करबद्ध निवेदन है कि उपर्युक्त तथ्यों, संवैधानिक मूल्यों एवं सामाजिक संतुलन को दृष्टिगत रखते हुए आवश्यक एवं सकारात्मक कार्यवाही करने की कृपा करने की मांग की गई। डीईओ को ज्ञापन सौपने के दौरान मुख्य रूप से राजकीय पालीटेक्निक खरसवां, प्राचार्य, डॉ सत्य देव राम, व्याख्याता डॉ पंकज कुमार, उतम कुमार, आनंद कुमार दलाई, सरिता महतो, दीप्ति कुमारी बदरा, विष्णु कुमार ट्यू ,कुनाल सोनी आदि उपस्थित थे।
