खरसावां में मना स्वतंत्रता सेनानी व हुल क्रांति के
महानायक वीर शहीद चानकु महतो की 169 वीं शहादत दिवस,
शहीद चानकु महतो गुमनाम क्रांति के महानायक थे-पंकज
kharsawan खरसावां के चांदनी चौक स्थित वीर शहीद निर्मल महतो भवन में स्वतंत्रता सेनानी व हुल क्रांति के महानायक वीर शहीद चानकु महतो की 169 वीं शहादत दिवस कुड़मि समाज खरसावां-कुचाई ईकाई की ओर से मनायी गयी। कार्यक्रम के प्रमुख पंकज कुमार महतो ने कहा कि हुल विद्रोह के महानायक चानकु महतो अब तक एक गुमनाम क्रांति के महानायक थे। जिन्हें इतिहास में उतना जगह नहीं मिला परंतु आज हमारे राज्य के महामहिम राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने 169 वीं शहादत दिवस के उपलक्ष में पूर्वी सिंहभूम स्थित चाकुलिया के भालुकबिंधा (मेमक्लब) में मूर्ति अनावरण कर झाड़खंड के जनता को जगाने का काम किये है। इसके लिए हम सभी शहीद के प्रति श्रद्धांजलि अर्पण करते हैं और महामहिम को धन्यवाद देते हुए आभार व्यक्त करते हैं। इस मौके पर खरसावां मॉडल स्कूल के शिक्षक जीडी महन्त ने वीर शहीद चानकु महतो के व्यक्तित्व और कृतित्व का वर्णन कहा कि स्वतंत्रता सेनानी और हुल क्रांति के महानायक चानकु महतो के आंदोलन के कारण गोड्डा क्षेत्र में कई वर्षों तक ब्रिटिश सरकार को मालगुजारी लेना मुश्किल हो गया था। वहीं ब्रिटिश सरकार द्वारा बसाये गए संथालों को ब्रिटिशों के खिलाफ लड़वाने और हौसला देने का काम इन्होंने ही प्रारंभ किया था। क्रांति के महानायक चानकु महतो ने ही सबसे पहले महतो माझी भाई-भाई जैसे नारा देकर हुल विद्रोह को मानते हुए अपने आंदोलन को पूरे साथियों के साथ संथाल विद्रोह में शामिल हो गए। सिद्धू कान्हू ने 30 जून 1855 को संथाल परगना के हजारों लोगों के साथ मिलकर एक जनसभा का आयोजन किये थे। जिसमें मुख्य रूप से क्रांति के महानायक चानकु महतो भी शामिल थे। इस जनसभा में ब्रिटिशों के खिलाफ विद्रोह की ज्वाला धधक उठीं । कहा जाता है विद्रोह में हजारों आदिवासी मूलवासी मारे गए थे। परंतु नेतृत्वकर्ता चानकु महतो पुलिस के हथियार और पकड़ से बच निकल थे। इसके बाद 1855 के अक्टूबर महीने में सोनार चौक में जनसभा बुलाई गई इसके मुख्यवक्ता चानकु महतो थे। जहा इस युद्ध में चानकु महतो घायल हो गए। परंतु साहस और पराक्रम के वीर चानकु महतो को उनके साथियों ने उन्हें ननिहाल बाड़ेडीह गांव में ले गए। जब अंग्रेजों को पता चला कि चानकु महतो अपने मामा घर में इलाजरत है। उन्हें गिरफ्तार कर अंग्रेजी सिपाहियों ने कई दिनों तक क्रूरतापूर्वक यातनाएं दी। उसके बाद 15 मई 1856 को गोड्डा के राज कचहरी स्थित कझिया नदी के किनारे उन्हें फांसी दे दी गई। इस दौरान उपस्थित लोगों ने निर्णय लिया कि खरसावां और कुचाई प्रखंड एक विशेष स्थान पर वीर शहीद चानकु महतो की मूर्ति स्थापित की जाएगी। इस दौरान मुख्य रूप से महेश्वर महतो, बाबलु महतो, विशेश्वर महतो, विनोद महतो, गदाधर महतो, प्रियरंजन महतो एमेन नाग, महावीर महतो, रमेश महतो, कैलाश महतो, संजय महतो, महावीर महतो, लोकनाथ महतो, मंटू महतो, दयाल महतो, मनबोध महतो, मिलन महतो आदि उपस्थित थे।
August 3, 2026 5: 02 am
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