पहल: पश्चिम बंगाल में सरायकेला छऊ कला की धूम; पहली बार पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में खुलेगा प्रोडक्शन सेंटर,.
Seraikella
सरायकेला। कहा जाता है कि सोलह कलाओं की नगरी कही जाने वाली सरायकेला से जन्मी विश्व प्रसिद्ध सरायकेला छऊ नृत्य कला सभी धर्म बंधन, समुदाय बंधन और जाति बंधन से परे सामाजिक समरसता का एक अनुपम शास्त्रीय नृत्य कला है। सरायकेला की विश्वप्रसिद्ध छऊ नृत्य शैली को नई पहचान और विस्तार देने की दिशा में अब पहली बार पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में सरायकेला छऊ नृत्य का एक प्रोडक्शन सेंटर खोले जाने की तैयारी है। इस प्रोडक्शन सेंटर का संचालन पद्मश्री सम्मानित गुरु शशदार आचार्य द्वारा किया जाएगा। यह पहल न केवल सरायकेला छऊ नृत्य के संरक्षण और संवर्धन की दृष्टि से अहम मानी जा रही है, बल्कि इससे स्थानीय एवं क्षेत्रीय कलाकारों को रोजगार और मंच भी उपलब्ध होगा। प्रारंभिक चरण में इस प्रोडक्शन सेंटर से 10 से 12 प्रशिक्षित कलाकारों को जोड़ा जाएगा। इसके बाद धीरे-धीरे और भी कलाकारों को इस केंद्र से जोड़ा जाएगा, जिससे छऊ नृत्य से जुड़े युवाओं को प्रशिक्षण, अभ्यास और प्रस्तुति का निरंतर अवसर मिल सकेगा।
सरायकेला छऊ नृत्य कला को विशुद्ध मूल रूप में संजोने की पहल:-
प्रोडक्शन सेंटर के माध्यम से सरायकेला शैली की शुद्ध परंपरा, भाव-भंगिमा, मुखौटा कला और शास्त्रीय तत्वों को संरक्षित रखते हुए मंच प्रस्तुतियां तैयार की जाएंगी। पश्चिम बंगाल में अब तक मानभूम-पुरुलिया एवं अन्य पारंपरिक छऊ शैलियों के केंद्र कार्यरत हैं, लेकिन पहली बार सरायकेला शैली के छऊ नृत्य का प्रोडक्शन सेंटर खोला जा रहा है। इससे सरायकेला छऊ को एक नए क्षेत्र में पहचान मिलने की उम्मीद है। इस केंद्र से जुड़े कलाकारों को देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी सरायकेला छऊ नृत्य प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस नृत्य शैली की लोकप्रियता और बढ़ेगी।
पद्मश्री गुरु शशधर आचार्य:-
देश सहित विदेशों में भी सरायकेला छऊ नृत्य कला का परचम लहरा चुके आचार्य छऊ नृत्य विचित्रा सरायकेला के निदेशक पद्मश्री गुरु शशधर आचार्य बताते हैं कि आज सरायकेला छऊ नृत्य कला से जुड़े दर्जनों कलाकार और जानकार मंच एवं रोजगार के अभाव में गुमनामी की अवस्था में है। प्रोडक्शन सेंटर के माध्यम से एक प्रयास है कि ऐसे कलाकारों को अवसर एवं मंच प्रदान कर उनकी पहचान स्थापित की जाए। साथ ही उनके लिए रोजगार के अवसर उत्पन्न कर उन्हें सरायकेला छऊ नृत्य कला के प्रति समर्पित बनाया जा सके। इससे विश्व प्रसिद्ध सरायकेला छऊ नृत्य कला का मूल रूप में संरक्षण एवं संवर्धन संभव हो सकेगा।
