चाईबासा में थैलेसीमिया मरीजों को एचआईवी पॉजिटिव रक्त चढ़ाए जाने की घटना के बाद पूरे कोल्हान में रक्त जांच की प्रक्रिया को और अधिक सुरक्षित बनाने के प्रयास शुरू,
Seraikella
सरायकेला।चाईबासा ब्लड बैंक में थैलेसीमिया मरीजों को एचआईवी पॉजिटिव रक्त चढ़ाए जाने की घटना के बाद पूरे कोल्हान में रक्त जांच की प्रक्रिया को और अधिक सुरक्षित बनाने के प्रयास शुरू हो चुके हैं। इसी कड़ी में शनिवार से सरायकेला सदर अस्पताल स्थित ब्लड बैंक में एलाईजा टेस्ट की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है।

अब सदर अस्पताल के ब्लड बैंक में रक्त के लेनदेन की प्रक्रिया पूरी तरह से सुरक्षा मानकों के तहत की जा रही है।ब्लड बैंक में फिलहाल पांच प्रकार के अनिवार्य जांच एलाईजा मशीन से की जा रही हैं, जिनमें एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, वीडीआरएल और मलेरिया की जांच शामिल है। चाईबासा की घटना की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सरायकेला ब्लड बैंक विशेष सावधानी बरत रहा है। एचआईवी, हेपेटाइटिस बी और सी की जांच एलाईजा टेस्ट के बाद नेट टेस्ट के लिए सैंपल रांची भेजे जा रहे हैं, ताकि किसी भी प्रकार की संक्रमण संभावना को पूरी तरह समाप्त किया जा सके।जानकारी के अनुसार, एलिसा टेस्ट का विंडो पीरियड 32 दिनों का होता है, जबकि नेट टेस्ट में यह मात्र 5 से 12 दिनों का रहता है, जिससे संक्रमण का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।

वहीं रैपिड टेस्ट में यह अवधि तीन से चार महीने तक की होती है। इसी वजह से अब हर रक्त यूनिट को पहले एलिसा टेस्ट से गुजरने के बाद नेट टेस्ट के लिए भेजा जाएगा।सिविल सर्जन डॉ. सरयू प्रसाद सिंह ने बताया कि जिले में सुरक्षा के सभी मानकों का पालन किया जा रहा है ताकि जरूरतमंद मरीजों को शत-प्रतिशत सुरक्षित रक्त उपलब्ध कराया जा सके। उन्होंने यह भी बताया कि एलिसा टेस्ट संचालन हेतु ब्लड बैंक के दो कर्मियों अरधेंदू और शिव को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है, जो इस कार्य को सटीकता से अंजाम दे रहे हैं।ब्लड बैंक प्रबंधन ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी प्रकार ब्लड लेने केे बदले रक्त नहीं लिया जाएगा, बल्कि केवल स्वेच्छा से आने वाले दाताओं का रक्त ही एकत्र किया जाएगा। इसके अलावा स्वास्थ्य विभाग के निर्देशानुसार 12 से 28 नवंबर तक जिले के विभिन्न स्थानों पर स्वच्छ रक्तदान शिविरों का आयोजन किया जाएगा। इस अवधि में अधिक से अधिक रक्त संग्रह करने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि आपातकाल या जरूरत की स्थिति में किसी भी मरीज को रक्त की कमी का सामना न करना पड़े।
